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कला, सच और राजनीति

हैरॉल्ड पिंटर

07 दिसंबर, 2005

1958 में मैने यह लिखा था:

"कोई चीज़ सच या झूठ में से एक ही हो ऐसा कोई ज़रूरी नहीं है; एक ही चीज़ सच और झूठ दोनों एक साथ हो सकती है। वास्तविक और अवास्तविक के बीच कोई ठोस अंतर नहीं है, ना ही जो सच है और जो झूठ है उसके बीच।"

मेरा मानना है कि ये बातें कुछ मायने रखती हैं और अब भी कला के द्वारा वास्तविकता की खोज पर लागू होती हैं। इसलिए एक लेखक होने के नाते तो मैं इनका समर्थन करता हूँ पर बतौर एक नागरिक मैं ऐसा नहीं कर सकता। एक नागरिक के तौर पर मुझे पूछना पड़ेगा: सच क्या है? झूठ क्या है?

नाटक में सच हमेशा अप्राप्य होता है। आप कभी उस तक पहुँच नहीं पाते पर उसकी खोज छोड़ी भी नहीं जा सकती। यह खोज ही पूरे प्रयास को चलाती है। यह खोज ही आपका काम है। अक्सर आप अंधेरे में सच के आस-पास पहुँच जाते हैं, उससे टकराते हुए या सिर्फ़ एक छवि या आकार की झलक पाते हुए जिसका सच से साम्य दिखता है, अक्सर अनजाने में ही। लेकिन असली सच तो यह है कि नाटक कला में एकमात्र सच जैसी कोई चीज़ नहीं होती। कई सच होते हैं। ये एक-दूसरे को चुनौती देते हैं, एक-दूसरे से टकरा कर मुड़ जाते हैं, एक-दूसरे पर प्रकाश डालते हैं, एक-दूसरे को नज़रअंदाज़ करते हैं, एक-दूसरे के प्रति पूरी तरह अनजान भी होते हैं। कभी-कभी आपको लगता है कि एक क्षण का सच आपने पा लिया है, लेकिन फिर यह आपके हाथों से फिसल जाता है।

मुझ से अक्सर पूछा जाता है कि मेरे नाटक किस तरह जन्म लेते हैं। मैं भी नहीं बता सकता। ना ही मैं कभी अपने नाटकों का सारांश बता सकता हूँ, सिवाय यह कहने के कि जैसा हुआ वैसा हुआ। ऐसा उन्होंने कहा। ऐसा उन्होंने किया।

अधिकतर नाटक तो किसी एक पंक्ति, किसी एक शब्द, किसी एक छवि से जन्म लेते हैं। पहले कोई खास शब्द आता है, फिर एक छवि आती है। मैं दो उदाहरण देता हूँ दो पक्तियों के जो अचानक कहीं से मेरे दिमाग़ में आ गईं, और जिनके पीछे एक छवि आ गई, और उसके बाद मैं था।

उन नाटकों का नाम है 'द होमकमिंग' और 'ओल्ड टाइम्स'। 'द होमकमिंग' की पहली पंक्ति है 'कैंचियों का तुमने क्या किया?' ('व्हाट हैव यू डन विद द सिज़र्स?') 'ओल्ड टाइम्स' की पहली पंक्ति है 'काला' ('डार्क')।

दोनों ही मामलों में मेरे पास कोई और जानकारी नहीं थी।

पहले मामले में इतना तो साफ़ था कि कोई व्यक्ति एक कैंची ढूंढ रहा था और किसी और व्यक्ति, जिस पर उसे शायद कैंची चुराने का शक था, से उसके बारे में जानकारी मांग रहा था। लेकिन मुझे किसी तरह इतना पता था कि जिस व्यक्ति से पूछा जा रहा था उसे ढेले भर परवाह नहीं थी, ना कैंची की और ना ही पूछने वाले की।

'काला' ('डार्क') को मैने किसी के बालों के, किसी स्त्री के बालों के, रंग का वर्णन समझा, और यह किसी के प्रश्न का उत्तर था। दोनों ही मामलों में मैंने अपने को मामले की गहराई में जाने के लिए मज़बूर पाया। ऐसा दृश्यात्मक तौर पर हुआ, छाया से रौशनी में बहुत ही धीरे से जाते हुए।

मैं हर नाटक की शुरुआत में चरित्रों को क, ख और ग कहता हूं।

जो नाटक बाद में 'द होमकमिंग' बना, उसकी शुरुआत में मैंने एक आदमी को एक सादे, निराश से कमरे में आकर एक प्रश्न पूछते देखा एक कम उम्र के आदमी से जो एक गंदे से सोफ़े पर बैठ कर घुड़दौड़ का अखबार पढ़ रहा है। मुझे किसी तरह शक हुआ कि क पिता था और ख उसका बेटा था, पर मेरे पास कोई सबूत नहीं था। लेकिन मेरा अनुमान थोड़ी ही देर में सही साबित हो गया जब ख (जो बाद में लेनी बना) ने क (जो बाद में मैक्स बना) से पूछा, 'पापा, अगर आप को ऐतराज़ न हो तो मैं विषय बदल दूं? मैं कुछ पूछना चाहता हूं। हमने अभी जो खाना खाया, उसका नाम क्या था? उसको क्या कहते हैं? आप एक कुत्ता क्यों नहीं खरीद लेते? आप तो कुत्तों के बावर्ची हैं। सही में। आप शायद यह सोच कर खाना बनाते हैं कि बहुत से कुत्तों के लिए बना रहे हैं।' तो क्योंकि ख क को 'पापा' कह कर संबोधित कर रहा इसलिए यह मानना तर्कसंगत होगा कि वे पिता और पुत्र हैं। यह भी साफ़ है कि क बावर्ची है और उसकी पाककला को बहुत अच्छी नज़रों से नहीं देखा जाता। क्या इसका मतलब है कि कोई माँ नहीं थी? मुझे नहीं पता था। लेकिन, जैसा कि मैंने उस समय अपने से कहा, हमारे आगाज़ को हमारे अंजाम का पता नहीं होता।

'अंधेरा।' एक बड़ी खिड़की। शाम के वक़्त आसमान। एक आदमी, क (जो बाद में डीले बना), एक औरत, ख (जो बाद में केट बनी), कुछ पीते हुए बैठे हैं। 'मोटा या पतला?' आदमी पूछता है। वो किस बारे में बात कर रहे हैं? पर फिर मैं एक और औरत, ग (जो बाद में ऐना बनी), को देखता हूँ अलग तरह के प्रकाश में, उनकी तरफ पीठ किए, उसके काले बालों सहित।

यह एक अजीब सा क्षण है, ऐसा क्षण जिसमें वे चरित्र बनते हैं जिनका उस क्षण तक कोई अस्तित्व नहीं था। उसके बाद जो आता है वह जैसे झटकों में आता है, अनिश्चित, यहाँ तक कि दिवास्वप्न जैसा होता है, हालांकि कभी-कभी यह ऐसे तूफान की तरह भी आता है जो रुकने नाम ही न ले। लेखक की हालत बड़ी अजीब सी होती है। एक तरह से चरित्र उसका स्वागत नहीं करते। चरित्र उसका प्रतिरोध करते हैं, उनके साथ जीना आसान नहीं है, उनको परिभाषित करना असंभव है। आप उनको आदेश तो नहीं ही दे सकते। एक हद तक आप उनके साथ एक अंतहीन खेल खेलते हैं, चूहे बिल्ली का खेल, छुपा-छिपी का खेल। लेकिन आखिर में आप पाते हैं कि आपके हाथों में हाड़-मांस वाले लोग हैं, लोग जिनकी इच्छाशक्ति है और अपनी ही व्यक्तिगत भावनाएं हैं और समझदारी है, उन अंशों से बनी हुई जिन्हें आप बदल नहीं सकते, धोखा नहीं दे सकते, अपने हिसाब से तोड़-मरोड़ नहीं सकते।

तो कला में भाषा एक बहुत ही अनेकार्थी व्यापार बन कर रह जाती है, एक दलदल, एक लचीला जाल जिस पर उछला जा सकता पर कितना ऊंचा यह निश्चित नहीं है, एक जमा हुआ तालाब जिस पर चलने से वह आपके, लेखक के, पांवों के नीचे से निकल सकता है, किसी भी समय।

लेकिन जैसा मैंने कहा, सच की खोज तो कभी रुकती नहीं। इसे थोड़े से समय के लिए रोका तो जा सकता है, पर इसे स्थगित नहीं किया जा सकता। इसका सामना तो करना ही पड़ता है, वहीं पर, उसी जगह।

राजनैतिक मंच एकदम अलग तरह की समस्याएं पेश करता है। भाषणबाज़ी से तो हर हालत में बचना होता है। वस्तुनिष्ठता अनिवार्य है। चरित्रों को अपने ही वातावरण में साँस लेने देना चाहिए। लेखक उन्हें अपनी रुचि या झुकाव या पूर्वग्रहों के आधार पर सीमाबद्ध करके या रोक कर नहीं रख सकता। उसे तैयार रहना चाहिए उन तक सभी कोणों, पूरे और हर तरह के परिप्रेक्ष्यों से पहुंचने के लिए, उन्हें चकित करने के लिए, शायद, कभी-कभार, पर फिर भी जिस रास्ते वे जाना चाहें उस रास्ते उन्हें जाने देने की स्वतंत्रता देने के लिए। हमेशा यह तरीका काम नहीं करता। और राजनैतिक व्यंग्य तो निश्चित ही इन सभी नियमों का पालन नहीं करता, बल्कि इनके बिल्कुल विपरीत जाता है, जो कि उसका सही में काम भी है।

मेरा ख्याल है अपने नाटक 'जन्मदिन का जश्न (द बर्थडे पार्टी)' में मैंने अंततः एक विजेता कर्म पर ध्यान केंद्रित करने से पहले ढेर सारे विकल्पों को संभावनाओं के घने जंगल में काम करने दिया था।

'पर्वत भाषा (माउंटेन लैंग्वेज)' में ऐसे असीमित विकल्पों के साथ काम करने का कोई दावा नहीं है। वह क्रूर, छोटा और भद्दा है। लेकिन नाटक के सिपाही फिर भी उसमें कुछ मनोरंजन कर लेते हैं। हम कभी-कभी भूल जाते हैं कि यातना देने वाले आसानी से ऊब भी जाते हैं। उन्हें अपना मनोबल बनाए रखने के लिए थोड़ा हँसने की ज़रूरत होती है। और यह साबित भी हो गया है बग़दाद में अबू ग़रेब की घटनाओं से। 'पर्वत भाषा' केवल 20 मिनट लंबा है, पर यह घंटे के बाद घंटे तक चलता रह सकता है, चलता रह सकता है, उसी ढांचे को बार-बार दोहराते हुए, एक के बाद एक घंटे तक।

दूसरी तरफ, मुझे लगता है, 'राख से राख (ऐशेज़ टु ऐशेज़)' जैसे पानी के नीचे घट रहा हो। एक डूबती हुई औरत, उसका हाथ लहरों के बीच से उठता हुआ, नज़रों से दूर गिरता हुआ, दूसरों तक पहुंचता हुआ, लेकिन किसी को वहाँ न पाता हुआ, न पानी से ऊपर न पानी से नीचे, केवल छायाओं को पाता हुआ, प्रतिबिंब, तैरते हुए; एक औरत एक डूबते हुए दृश्य में खोई हुई आकृति, एक औरत जो उस विनाश से बच नहीं पा रही जो लगता था दूसरों के ही भाग्य में है।

लेकिन जैसे दूसरों को मरना पड़ा, वैसे ही उसे भी मरना होगा।

राजनैतिक भाषा, जैसे राजनीतिज्ञों द्वारा प्रयोग की जाती है, ऐसे किसी क्षेत्र में कदम नहीं रखती क्योंकि अधिकांश राजनीतिज्ञ, हमें उबलब्ध साक्ष्यों के आधार पर, सच में रुचि नहीं रखते बल्कि ताकत में और ताकत को बनाए रखने में रुचि रखते हैं। ताकत को बनाए रखने के लिए अनिवार्य है कि लोग अज्ञान में रहें, कि वे सच से अनभिज्ञ रहें, अपनी ज़िंदगियों के सच से भी। इसलिए जो हमारे चारों तरफ है वह झूठों की विशाल बुनावट है, जिस पर हम ज़िंदा रहते हैं।

जैसा कि यहाँ मौजूद हर व्यक्ति जानता है, ईराक़ पर आक्रमण करने का कारण यह था कि सद्दाम हुसैन के पास व्यापक विनाश के हथियारों का बहुत ही खतरनाक जखीरा है, जिसमें से कुछ 45 मिनटों में ही दागा जा सकता है और भयंकर तबाही ला सकता है। हमें यकीन दिलाया गया था कि यह सच है। यह सच नहीं था। हमें बताया गया था कि ईराक़ के संबंध अल क़ायदा से हैं और न्यूयॉर्क में 11 सितंबर 2001 को हुई नृशंसता में उसकी भी कुछ ज़िम्मेदारी है। हमें विश्वास दिलाया गया कि यह सच है। यह सच नहीं था। हमें बताया गया कि ईराक़ से पूरी दुनिया की सुरक्षा को खतरा है। हमें विश्वास दिलाया गया कि यह सच है। यह सच नहीं था।

सच तो बिल्कुल ही अलग है। सच का संबंध इस बात से है कि संयुक्त राज्य दुनिया में अपनी भूमिका को किस तरह समझता है और किस तरह उसे कार्यान्वित करना पसंद करता है।

लेकिन इससे पहले कि मैं वर्तमान पर वापस आऊं, मैं अभी हाल ही के अतीत पर एक नज़र डालना चाहूंगा, जिससे मेरा मतलब है दूसरे विश्व युद्ध के अंत के बाद से संयुक्त राज्य की विदेश नीति। मेरा मानना है कि यह हमारा दायित्व है कि हम इस दौर के बारे में किसी न किसी तरह की थोड़ी सी तो छानबीन करें, क्योंकि उतना कर पाने लायक ही समय यहाँ उपलब्ध है।

हर कोई जानता है कि युद्ध के बाद के दौर में सोवियत संध में तथा सारे ही पूर्वी यूरोप में क्या हुआ: सुव्यवस्थित नृशंसता, व्यापक अत्याचार, स्वतंत्र सोच का क्रूर दमन। यह सब दस्तावेजों में दर्ज है और इसका सत्यापन किया जा सकता है।

लेकिन मेरा दावा यहाँ यह है कि इसी दौर के संयुक्त राज्य द्वारा किए गए अपराधों को सतही तौर पर ही अंकित किया गया है, दस्तावेजों में दर्ज करना या स्वीकार करना या अपराध के तौर पर पहचाना जाना तो दूर की बात है। मेरा विश्वास है कि इस कमी को पूरा किया जाना चाहिए और दुनिया अभी जहाँ है उससे इस सच का बहुत निकट का संबंध है। सोवियत संघ के अस्तित्व से कुछ सीमा तक बंधे होने के बावजूद संयुक्त राज्य की पूरे विश्व में कार्यवाहियाँ इस बात को साफ कर देती हैं कि संयुक्त राज्य ने यह निष्कर्ष निकाल लिया था कि उसे जो चाहे करने का अधिकार है।

स्वयंभू राज्यों पर सीधा आक्रमण अमेरिका का पसंदीदा तरीका कभी भी नहीं रहा है। मुख्यतः उसने वह तरीका पसंद किया है जिसे 'कम तीव्रता वाला टकराव' कहा जाता है। कम तीव्रता वाले टकराव का मतलब है कि हज़ारों लोग मरते हैं, लेकिन उन सभी को एक बम गिरा कर मारने की तुलना में धीरे-धीरे। इसका मतलब है कि आप देश के दिल को संक्रमित कर देते हैं, कि आप घाव बना देते हैं और गैंग्रीन के फलने का इंतज़ार करते हैं। जब जनता को झुका लिया जाता है – या पीट-पीट के मार डाला जाता है – जो कि एक ही बात है – और आपके ही मित्र, सेना तथा विशाल निगम, सत्ता पर आराम से काबिज़ हो जाते हैं, तब आप कैमरे के सामने जा कर कहते हैं कि जनतंत्र को बचा लिया गया है। यह संयुक्त राज्य की विदेश नीति में उस दौरान आम बात थी जब की मैं बात कर रहा हूं।

निकारागुआ की त्रासदी एक बहुत ही ध्यान देने लायक मामला है। इसे मैं यहाँ विश्व में उसकी भूमिका के बारे में अमेरिका के दृष्टिकोण के उदाहरण के तौर पर प्रस्तुत करना चाहूंगा, तब भी और अब भी।

मैं 1980 के दशक के उत्तरार्ध में लंदन स्थित अमरीकन दूतावास में एक सभा में उपस्थित था।

संयुक्त राज्य की कौंग्रेस उस समय इस बात पर निर्णय लेने वाली थी कि कौंट्रा दल को निकारागुआ की सरकार के विरुद्ध उसके अभियान के लिए और धन दिया जाए या नहीं। मैं उस प्रतिनिधि मंडल का सदस्य था जो निकारागुआ की तरफ से बोलने वाली थी, पर उस प्रतिनिधि मंडल के सबसे महत्वपूर्ण सदस्य फ़ादर जॉन मेटकाफ़े थे। संयुक्त राज्य के दल के प्रमुख रेमंड साइत्ज़ थे (उस समय राजदूत के बाद दूसरे स्थान पर, लेकिन बाद में खुद राजदूत)। फ़ादर मेटकाफ़े ने कहा: 'सर, मैं निकारागुआ के उत्तर में एक पैरिश चलाता हूं। मेरे पैरिश के सदस्यों ने एक स्कूल, एक स्वास्थ्य केंद्र, एक सांस्कृतिक केंद्र बनाया है। हम शांति से रह रहे थे। कुछ महीने पहले कौंट्रा बल ने पैरिश पर आक्रमण कर दिया। उन्होंने सब कुछ नष्ट कर डाला: स्कूल, स्वास्थ्य केंद्र, सांस्कृतिक केंद्र। उन्होंने नर्सों और अध्यापिकाओं के साथ बलात्कार किया, चिकित्सकों को मार डाला, बहुत ही नृशंस तरीके से। वो जंगलियों की तरह व्यवहार कर रहे थे। कृपया आप संयुक्त राज्य की सरकार से इस बात की मांग करें कि वह इस तरह की घृणित आतंकवादी कार्यवाहियों से अपना समर्थन वापस ले ले।'

रेमंड साइत्ज़ की एक तार्किक, ज़िम्मेदार तथा अत्यंत परिष्कृत व्यक्ति के तौर पर अच्छी खासी प्रतिष्ठा थी। उनका राजनयिकों के बीच बड़ा सम्मान था। उन्होंने बात सुनी, कुछ देर चुप रहे और फिर बड़ी गंभीरता से बात शुरू की। 'फ़ादर', उन्होंने कहा, 'मैं आपको एक बात बताता हूं। युद्ध में हमेशा निर्दोष लोगों को कष्ट उठाने पड़ते है।' कुछ देर एकदम बर्फीली चुप्पी रही। हम उनको घूरते रहे। उनके माथे पर शिकन तक नहीं आई।

निर्दोष लोग, सही में, हमेशा कष्ट उठाते हैं।

आखिर में किसी ने कहा: 'लेकिन इस मामले में तो "निर्दोष लोग" औरों के अलावा आपकी सरकार द्वारा प्रायोजित की गई भयानक नृशंसता के शिकार थे। अगर कौंग्रेस कौंट्राओं को और अधिक धन देती है तो इस तरह के अत्याचार आगे भी होंगे। ऐसा नहीं है क्या? क्या आपकी सरकार इसलिए एक स्वयंभू राष्ट्र के नागरिकों के विरुद्ध हत्या तथा विनाश के कुकर्मों को प्रोत्साहित करने की अपराधी नहीं है?'

साइत्ज़ पर इसका कोई असर नहीं पड़ा। 'मैं इस बात से सहमत नहीं हूं कि तथ्य जैसे प्रस्तुत किए गए हैं वो आपके दावों का समर्थन करते हैं,' उन्होंने कहा।

जब हम दूतावास से वापस जा रहे थे, संयुक्त राज्य के एक राजनयिक ने मुझसे कहा कि उसे मेरे नाटक अच्छे लगे। मैंने जवाब नहीं दिया।

मुझे आपको याद दिलाना चाहिए कि उस समय राष्ट्रपति रीगन ने यह बयान जारी किया था: "कौंट्रा हमारे फ़ाउंडिंग फ़ादर्स के नैतिक समतुल्य हैं।"

संयुक्त राज्य ने 40 साल से ज्यादा समय तक निकारागुआ में नृशंस सोमोज़ा तानाशाही का समर्थन किया था। निकारागुआ की जनता ने, सैंडीनिस्टाओं के नेतृत्व में, 1979 में एक आश्चर्यजनक लोकप्रिय क्रांति के द्वारा उस सरकार को उठा फेंका।

सैंडीनिस्टा दल के लोग सर्वगुणसंपन्न नहीं थे। उनमें भी अपने हिस्से का दर्प था और उनके राजनीतिक दर्शन में बहुत से परस्पर विरोधी तत्व थे। लेकिन वे बुद्धिमान, तार्किक तथा सभ्य थे। उन्होंने एक टिकाऊ, शालीन, विविधतावादी समाज बनाने की शुरूआत की थी। मृत्युदंड का उन्मूलन कर दिया गया। लाखों गरीबी में फंसे किसानों को जैसे मौत के मुंह से निकाल लाया गया। एक लाख से ज़्यादा परिवारों को ज़मीनों के पट्टे दिए गए। दो हज़ार स्कूल बनाए गए। एक अनूठे साक्षरता अभियान के द्वारा देश में निरक्षरता को घटा कर एक बटा सात से भी कम कर दिया गया। मुफ़्त शिक्षा तथा मुफ़्त स्वास्थ्य सेवा की शुरुआत की गई। शिशु मृत्यु दर को घटा कर एक तिहाई कर दिया गया। पोलियो का उन्मूलन कर दिया गया।

संयुक्त राज्य ने इन सब उपलब्धियों को मार्क्सवादी/लेनिनवादी विप्लव कह कर नकार दिया। संयुक्त राज्य की सरकार की दृष्टि में एक खतरनाक उदाहरण तैयार किया जा रहा था। अगर निकारागुआ को सामाजिक तथा आर्थिक न्याय के मूलभूत मानक स्थापित करने की अनुमति दे दी गई, अगर उसे स्वास्थ्य सेवा तथा शिक्षा के स्तर को ऊंचा करने और सामाजिक एकता एवं राष्ट्रीय आत्म सम्मान अर्जित करने की अनुमति दे दी गई तो उसके पड़ौसी देश भी वही सवाल पूछने लगेंगे और वैसे ही काम करने लगेंगे। उस समय एल साल्वाडोर में यथास्थिति के विरुद्ध भयंकर प्रतिरोध तो था ही।

मैंने पहले एक 'झूठों की बुनावट' की बात की जिसने हमें घेर रखा है। राष्ट्रपति रीगन निकारागुआ का ज़िक्र आम तौर पर एक 'स्वतंत्रताहीन अंधकूप' के तौर पर करते थे। मीडिया द्वारा, तथा ब्रिटिश सरकार द्वारा तो ज़रूर ही, इसे सटीक वर्णन तथा उचित टिप्पणी मान लिया गया था। लेकिन असल में सैंडीनिस्टा सरकार के राज में हत्यारी टोलियों के अस्तितव का कोई प्रमाण नहीं है। यातनाओं के कोई प्रमाण नहीं मिलते। सुव्यवस्थित या आधिकारिक सैनिक नृशंसता के भी कोई प्रमाण नहीं थे। निकारागुआ में कभी पादरियों की हत्या नहीं की गई। असल में तो सरकार में तीन पादरी थे, दो जेसूट और एक मेरीनॉल मिशनरी। स्वतंत्रताहीन अंधकूप तो असल में पड़ौस में थे, एल साल्वाडोर और ग्वाटेमाला में। संयुक्त राज्य ने जनतांत्रिक रूप से चुनी गई ग्वाटेमाला की सरकार को 1954 में गिरा दिया और अनुमान किया जाता है कि उसके बाद से एक के बाद एक आने वाली तानाशाह सैनिक सरकारों के हाथों 20,00,00 से ज़्यादा लोगों की जानें गईं।

विश्व के सबसे प्रतिष्ठित जेसूटों में से छः की सान साल्वाडोर स्थित मध्य अमरीकन विश्वविद्यालय में क्रूरता से हत्या कर दी गई, फ़ोर्ट बेनिंग, जॉर्जिया, संयुक्त राज्य अमरीका में प्रशिक्षित अलकात्ल रेजिमेंट की एक बटालियन द्वारा। उस असाधारण रूप से साहसी व्यक्ति आर्चबिशप रोमेरो की गिरजाघर में प्रार्थना करते समय हत्या कर दी गई। ऐसा अनुमान है कि 75,000 लोग मारे गए। उन्हें क्यों मारा गया? उन्हें मारा गया क्योंकि उनका विश्वास था कि एक बेहतर ज़िंदगी संभव है और उसे हासिल किया जाना चाहिए। इस एक विश्वास ने उन्हें तुरंत साम्यवादी कहलाने योग्य बना दिया। वे मारे गए क्योंकि उन्होंने यथास्थिति के विरूद्ध, गरीबी के अंतहीन पठार, बीमारी, ह्रास तथा ज़ुल्म के विरूद्ध सवाल खड़ा करने की हिम्मत की, जो कि उनका जन्मसिद्ध अधिकार था।

संयुक्त राज्य ने आखिर सैंडीनिस्टा सरकार को गिरा ही दिया। इसमें कुछ साल लगे और काफ़ी प्रतिरोध का सामना करना पड़ा लेकिन निर्दय आर्थिक उत्पीड़न तथा 30,000 मौतों ने अंततः निकारागुआ की जनता के जोश पर विजय पा ही ली। वे थक चुके थे और एक बार फिर गरीबी के शिकार बन गए। केसीनो फिर देश में लौट आए। मुफ़्त स्वास्थ्य सेवा और मुफ़्त शिक्षा का दौर खत्म हो गया। विशाल व्यापार ज़ोर-शोर से लौट आया। 'जनतंत्र' की जीत हुई थी।

लेकिन यह 'नीति' किसी मायने में मध्य अमरीका तक ही सीमित नहीं थी। इसे पूरे विश्व में लागू किया जा रहा था। यह तो अंतहीन है। और ऐसे है जैसे कभी कुछ हुआ ही नहीं हो।

संयुक्त राज्य ने दूसरे विश्व युद्ध के बाद से दक्षिणपंथी सैनिक तानाशाह सरकारों का समर्थन किया और कई मामलों में तो उनको जन्म भी दिया। मेरा इशारा इंडोनेशिया, यूनान, उरूगुए, ब्राज़ील, परागुए, हेती, तुर्की, फिलीपीन्स, ग्वाटेमाला, एल साल्वाडोर की तरफ है, और हाँ, चिली की तरफ तो ज़रूर ही। जो संत्रास संयुक्त राज्य ने चिली पर 1973 में थोपा था उसकी भरपाई तो कभी नहीं की जा सकती और न उसे कभी भुलाया जा सकता है।

इन सभी देशों में लाखों लोग मौत का शिकार हुए। क्या ये सब हत्याकांड हुए थे? क्या उन सब की ज़िम्मेदारी संयुक्त राज्य की विदेश नीति पर आती है? जवाब है कि हाँ हत्याकांड हुए थे और उनकी ज़िम्मेदारी अमरीकन विदेश नीति पर आती है। लेकिन आप को ऐसा लगेगा नहीं।

ऐसा कभी हुआ ही नहीं। कभी कुछ नहीं हुआ। जब यह सब हो रहा था, तब भी वो नहीं हो रहा था। उसका कोई महत्व नहीं था। वह ध्यान देने लायक बात नहीं थी। संयुक्त राज्य के अपराध बहुत ही व्यवस्थित, अविरत, क्रूर, पछतावा रहित हैं, लेकिन कुछ ही लोगों ने असल में उनके बारे में बात की है। इस बात का श्रेय तो आपको अमरीका को देना पड़ेगा। उसने सर्वहित के लिए जुटी एक ताकत के भेष में पूरी दुनिया के लोगों पर अचूक तरीके से अपना ज़ोर बना रखा है। यह आश्चर्यजनक, एक तरह से मज़ेदार, अत्यंत सफल सम्मोहन का कारनामा रहा है।

मेरा आपसे कहना है कि संयुक्त राज्य बिला-शक मेले का सबसे बड़ा तमाशा है। नृशंस, उदासीन, तिरस्कारपूर्ण और निर्दय चाहे यह हो, लेकिन यह बहुत चतुर भी है। एक विक्रेता के तौर पर यह अपने पर ही निर्भर है और इसकी सबसे अधिक बिकने वाली वस्तु आत्मरति है। इसकी कोई बराबरी नहीं है। अमरीकन राष्ट्रपतियों को टेलीविज़न पर ये शब्द कहते हुए सुनिए, 'अमरीकन जनता', जैसे कि इस वाक्य में, 'मैं अमरीकन जनता से कहता हूं कि यह प्रार्थना करने का और अमरीकन जनता के अधिकारों की रक्षा करने का समय है और मैं अमरीकन जनता से अपने राष्ट्रपति द्वारा अमरीकन जनता की तरफ़ से जो कदम अभी उठाए जाने वाले हैं उनमें विश्वास करने को कहता हूं।'

यह ग़जब की रणनीति है। भाषा का प्रयोग किया जा रहा है सोच-विचार को दूर रखने के लिए। ये शब्द 'अमरीकन जनता' सही में सांत्वना के एक भारी गद्दे का काम करते हैं। आपको सोचने की ज़रूरत नहीं है। सिर्फ़ गद्दे पर आराम से लेट जाइए। चाहे यह गद्दा आपकी बुद्धिमत्ता और आपकी सोच-विचार की क्षमता को घोंटे डाल रहा हो लेकिन यह है बहुत ही आरामदायक। लेकिन यह निश्चय ही उन 4 करोड़ लोगों के लिए नहीं है जो गरीबी की रेखा से नीचे रह रहे हैं और न ही उन 20 लाख औरतों-मर्दों के लिए जिन्हें पूरे अमरीका में फैली जेलों के भारी गुलाग में क़ैद करके रखा गया है।

संयुक्त राज्य अब कम तीव्रता वाले टकराव के बारे में चिंता नहीं करता। वो अब इस बारे में मौन रहने या घुमा फिरा के बात करने की ज़रूरत नहीं समझता। वो अपने कार्ड बिना डर या पक्षपात के मेज़ पर रख देता है। वो अब संयुक्त राष्ट्र, अंतर्राष्ट्रीय कानून या आलोचक असहमति की रत्ती भर चिंता नहीं करता, जिसे अब वो नपुंसक और बेमतलब मान कर चलता है। उसके पास अपना एक छोटा सा मिमियाता मेमना भी है जो पट्टे से बंधा उसके पीछे-पीछे आता रहता है, दयनीय और दंडवत ग्रेट ब्रिटेन।

हमारी नैतिक संवेदना को क्या हुआ? क्या वो हममें कभी थी? इन सब शब्दों का अर्थ क्या है? क्या ये उस चीज़ की तरफ़ इशारा करते हैं जिसका इस्तेमाल आजकल मुश्किल से ही कभी किया जाता है – अंतरात्मा या ज़मीर? सिर्फ़ अपने ही कामों के बारे में ज़मीर का इस्तेमाल ही नहीं, बल्कि दूसरों के द्वारा किए गए कृत्यों में हमारी साझा ज़िम्मेदारी? क्या ये सब चीज़ें मर चुकी हैं? ग्वांतानामो खाड़ी की तरफ़ देखिए। सैकड़ों लोगों को बिना किसी आरोप के तीन साल से ज़्यादा से क़ैद करके रखा गया है, बिना किसी कानूनी प्रतिनिधित्व या विधिसम्मत प्रक्रिया के, तकनीकी तौर पर हमेशा के लिए क़ैद करके। यह एकदम ग़ैरकानूनी संरचना है जिसे जेनेवा समझौते का पूरी तरह से अतिक्रमण करते हुए बना कर रखा गया है। इसे न सिर्फ़ बर्दाश्त किया जा रहा है बल्कि जिसे 'अंतर्राष्ट्रीय समुदाय' कहा जाता है उसके द्वारा नज़रअंदाज़ कर दिया गया है। यह आपराधिक कृत्य उस देश द्वारा किया जा रहा है जिसने खुद को 'आज़ाद दुनिया का नेता' घोषित कर रखा है। क्या वे ग्वांतानामो खाड़ी के बाशिन्दों के बारे में सोचते हैं? मीडिया उनके बारे में क्या कहता है? कभी-कभार उनका ज़िक्र होता है – छठे पृष्ठ पर एक छोटी सी खबर के रूप में। उन्हें ऐसी देशविहीन जगह में डाल दिया गया है जहाँ से शायद वे कभी लौट ही न पाएं। आज की तारीख में उनमें से कई भूख हड़ताल पर हैं, उन्हें ज़बरदस्ती खिलाया जा रहा है, और उनमें ब्रिटिश नागरिक भी शामिल हैं। ज़बरदस्ती खिलाए जाने की इस प्रक्रिया में कोई नज़ाकत जैसी चीज़ नहीं है। कोई सिडेटिव या ऐनेस्थेटिक नहीं। सिर्फ़ एक नली जिसे आपकी नाक या आपके गले में अटका दिया जाता है। आप खून की उलटी करते हैं। यह यातना है। ब्रिटेन के विदेश मंत्री का इस बारे में क्या कहना है? कुछ नहीं। ब्रिटेन के प्रधानमंत्री ने इस बारे में क्या कहा है? कुछ नहीं। क्यों नहीं? क्योंकि संयुक्त राज्य ने कह रखा है: ग्वांतानामो खाड़ी में हमारे कृत्यों की निंदा करना मित्रता का काम नहीं है। आप या तो हमारे साथ हैं या हमारे विरूद्ध हैं। तो ब्लेयर अपना मुंह बंद कर लेते हैं।

ईराक़ पर आक्रमण एक डकैतों वाला काम था, राज्य प्रायोजित आतंकवाद का एक काम, अंतर्राष्ट्रीय कानून के लिए घोर तिरस्कार दिखाते हुए। आक्रमण मनमानी सैनिक कार्यवाही का एक नमूना था, झूठ के ऊपर झूठ से प्रेरित तथा मीडिया और इसलिए जनता का चालाकी से इस्तेमाल करते हुए; एक ऐसा काम जिसका असली मकसद मध्य पूर्व पर सैनिक तथा आर्थिक नियंत्रण पक्का करना था लेकिन जिसे पेश किया गया – अंतिम अस्त्र के तौर पर – जब इसे सही ठहराने के बाकी सारे तरीके नाकामयाब हो गए – स्वतंत्रता के रूप में। हज़ारों-हज़ार निर्दोष लोगों की मौत तथा उनके अंग-भंग के लिए ज़िम्मेदार सैनिक बल का एक विकट दावा।

हम ईराक़ी लोगों के लिए यातनाएं, क्लस्टर बम, हल्का यूरेनियम, बेमतलब हत्या के अनगिनत कुकर्म, दरिद्रता, दुर्गति तथा मौत ले आए हैं और इसको 'मध्य पूर्व में स्वतंत्रता तथा जनतंत्र लाना' कह रहे हैं।

आपको कितने लोगों को मारना होता है जनसमूह का हत्यारा या युद्ध अपराधी कहलाने के लिए? एक लाख? मेरा ख्याल से इतना तो बहुत काफ़ी होगा। इसलिए न्यायसंगत तो यही होगा कि बुश और ब्लेयर को अंतर्राष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय के सामने दोषी ठहराया जाए। लेकिन बुश ने समझदारी से काम लिया है। उन्होंने अंतर्राष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय को स्वीकार ही नहीं किया है। और इसीलिए अगर कोई अमरीकी सैनिक, या राजनीतिज्ञ भी, अपने को आरोपित पाता है तो बुश ने चेतावनी दी है कि वे अमरीकी मरीनों को बचाने के लिए भेज देंगे। लेकिन टोनी ब्लेयर ने तो न्यायालय को स्वीकृत कर लिया है और इसलिए वे मुकद्दमा चलाने के लिए उपलब्ध हैं। अगर न्यायालय चाहे तो हम उनका पता बता सकते हैं। पता है नंबर 10, डाउनिंग स्ट्रीट, लंदन।

इस प्रसंग में मौत कोई मायने नहीं रखती। बुश और ब्लेयर दोनों मौत को दूर कबाड़खाने में डाल कर चलते हैं। ईराक़ी विप्लव शुरू होने से पहले कम से कम 100,000 ईराक़ी अमरीकन बमों तथा मिसाइलों से मारे जा चुके थे। उन लोगों की कोई गिनती नहीं है। उनकी मौतों का अस्तित्व ही नहीं है। बस खाली जगह है। उनको मृत के तौर पर दर्ज भी नहीं किया जा रहा है। 'हम लाशों की गिनती नहीं करते', अमरीकन जनरल टॉमी फ़्रैंक्स का कहना था।

युद्ध के शुरुआती दिनों में ब्रिटेन के अखबारों में मुख्य पृष्ठ पर टोनी ब्लेयर की एक तस्वीर छपी थी एक ईराक़ी बच्चे के गाल को चूमते हुए। 'एक कृतज्ञ बच्चा', फ़ोटो के नीचे शीर्षक था। कुछ दिन बाद एक और रिपोर्ट थी एक तस्वीर के साथ, अंदर के एक पृष्ठ पर, एक अन्य चार साल के बच्चे की जिसके हाथ नहीं थे। उसके परिवार को एक मिसाइल द्वारा उड़ा डाला गया था। केवल वही अकेला बचा था। 'मेरे हाथ वापस कब मिलेंगे?' उसने पूछा था। उस रिपोर्ट को छोड़ दिया गया। टोनी ब्लेयर ने उसके हाथ को अपने हाथ में नहीं ले रखा था, ना ही किसी और अंग-भंग हुए बच्चे के शरीर को, ना ही किसी खून सनी लाश को। खून मैला होता है। वो आपकी शर्ट और टाई को गंदा कर देता है जब आप टेलीविज़न पर संजीदा सा भाषण दे रहे होते हैं।

2,000 मृत अमरीकन कुछ शर्मिंदगी का कारण हैं। उन्हें उनकी कब्रों तक अंधेरे में ले जाया जा रहा है। अंतिम संस्कार चुपचाप किए जा रहे है, ताकि कोई गड़बड़ न होने पाए। अपंग अपने बिस्तरों में सड़ रहे हैं, उनमें से कुछ पूरी ज़िंदगी के लिए। तो मृत और अपंग दोनों सड़ रहे हैं, अलग-अलग तरह की कब्रों में।

पाब्लो नरूदा की एक कविता 'मैं कुछ बातें समझाना चाहूंगा' से मैं एक उद्धरण यहाँ देता हूँ:

फिर एक सुबह सब कुछ जल रहा था,
एक सुबह लपटें
उठ रही थीं ज़मीन से
इंसानों को खाती हुई
और फिर तब से आग,
बारुद फिर तब से,
और फिर तब से खून,

डकैत विमानों और मूरों के साथ,
डकैत अंगूठियों और डचेसों के साथ,
डकैत काले चोगे पहने आशीर्वाद छिड़काते फ़्रायरों के साथ,
आसमान से आए बच्चों को मारने के लिए
और बच्चों का खून बह रहा था गलियों में
किसी झंझट के बिना, जैसे बच्चों का खून बहता है।

सियार जिनसे सियार भी नफ़रत करेंगे
पत्थर जिनको खा कर कांटेदार पौधे थूक देंगे,
ज़हरीले नाग जिनसे ज़हरीले नाग भी घृणा करेंगे।

तुम्हारे आमने-सामने मैंने देखा है खून
स्पेन का, ज्वार की तरह मीनार जितना उठता हुआ
तुम्हें एक लहर में डुबाने के लिए
घमंड और खंजरों की

धोखेबाज़
सेनाधीशों:
मेरे मरे हुए घर को देखो,
टूटे हुए स्पेन को देखो:
हर घर से जलता लोहा बहता है
फूलों की बजाय
स्पेन के हर कोने से
स्पेन उभरता है
और हर मृत बच्चे से एक राइफ़ल जिसकी आंखें हैं
और हर अपराध से गोलियां पैदा होती हैं
जो एक दिन ढूंढ लेंगी
तुम्हारे दिल का निशाना

और तुम पूछोगे: इसकी कविता क्यों नहीं बात करती
स्वप्नों और पत्तों की
और इसके अपने देश के ज्वालामुखियों की

आओ और देखो खून को जो गलियों में बह रहा है।
आओ और देखो
खून को जो गलियों में बह रहा है।
आओ और देखो खून को
जो गलियों में बह रहा है!*

मुझे यहाँ यह बात एकदम साफ़ कर देनी चाहिए कि पाब्लो नेरूदा की कविता का उद्धरण देने में मैं किसी भी तरह से प्रजातांत्रिक स्पेन की तुलना सद्दाम हुसैन के ईराक़ से नहीं कर रहा हूं। मैं नेरूदा का उद्धरण दे रहा हूं क्योंकि समकालीन कविता में नागिरकों पर बमबारी का ऐसा शक्तिशाली सटीक विवरण मैंने कहीं नहीं पढ़ा है।

मैंने पहले कहा कि संयुक्त राज्य अब अपने कार्ड मेज़ पर रखने में ज़रा भी नहीं झिझकता। ऐसा ही है। उसकी घोषित नीति अब 'संपूर्ण स्पेक्ट्रम प्रभुत्व' के तौर पर पारिभाषित है। ये मेरे शब्द नहीं हैं, उनके हैं। 'संपूर्ण स्पेक्ट्रम प्रभुत्व' का मतलब है ज़मीन, समुद्र, हवा और अंतरिक्ष तथा उनमे जुड़े सभी संसाधनों पर नियंत्रण।

संयुक्त राज्य ने इस समय विश्व भर में 132 देशों में 702 सैनिक अड्डों पर कब्जा कर रखा है, स्वीडन के माननीय अपवाद के साथ। हमें ठीक से नहीं पता कि वो वहाँ तक कैसे पहुंचे पर वो वहाँ पर मौजूद तो ज़रूर हैं।

संयुक्त राज्य के पास 8,000 सक्रिय तथा तैयार नाभिकीय हथियार हैं। दो हज़ार तो घोड़े पर उंगली की तरह तैयार हैं, 15 मिनट की चेतावनी पर छोड़े जाने के लिए। वह और भी नये नाभिकीय बल वाले तंत्र विकसित कर रहा है, जिनको बंकर बस्टर्स कहा जा रहा है। ब्रिटिश, हमेशा साथ देते हुए, अपनी नाभिकीय मिसाइल ट्राइडेंट की जगह लेने के लिए नई मिसाइल बनाने की सोच रहे हैं। मैं यह सोच रहा हूं कि वे किस पर निशाना साध रहे हैं? ओसामा बिन लादेन? आप पर? मुझ पर? जो डोक्स पर? चीन पर? पैरिस पर? कौन जाने? हम जो जानते हैं वो यह है कि ये सब बचकाना पागलपल – नाभिकीय हथियारों को रखना और उनके इस्तेमाल की धमकी देना – वर्तमान अमरीकी राजनीतिक दर्शन के केंद्र में है। हमें खुद को याद दिलाना होगा कि संयुक्त राज्य स्थाई सैनिक जमावट की हालत में है और इसमें कोई कमी आने के कोई आसार नहीं दिखते।

संयुक्त राज्य के ही लाखों नहीं तो हज़ारों लोग स्पष्ट रूप से दुखी, लज्जित और गुस्से में हैं अपनी सरकार की कार्यवाहियों के कारण, लेकिन जैसी हालत अभी है उसमें वे एक संगठित राजनीतिक शक्ति नहीं हैं – अभी तक। किंतु वो चिंता, अनिश्चितता तथा डर जिसे हम संयुक्त राज्य में हर दिन बढ़ते हुए देख सकते हैं, उसमें कमी आनी वाली नहीं है।

मुझे पता है कि राष्ट्रपति बुश के पास कई अत्यंत सक्षम व्याख्यान लेखक हैं पर मैं इस काम के लिए खुद को पेश करना चाहूंगा। मैं नीचे दिया छोटा सा भाषण प्रस्तावित करना चाहूंगा जिसे वे टेलीविज़न पर राष्ट्र के समक्ष दे सकते हैं। मैं उन्हें देख सकता हूं, करीने से काढ़े हुए बाल, दिल जीतने वाली खरी, गंभीर, अक्सर मोहित करने वाली मुद्रा में, कभी-कभी टेढ़ी मुस्कान के साथ, अजीब रूप से आकर्षक, पुरुषों के पुरुष।

'ईश्वर अच्छा है। ईश्वर महान है। ईश्वर अच्छा है। मेरा ईश्वर अच्छा है। बिन लादेन का ईश्वर बुरा है। उसका ईश्वर बुरा है। सद्दाम का ईश्वर बुरा है, सिवाय इसके कि उसका कोई ईश्वर था ही नहीं। वो तो बर्बर था। हम बर्बर नहीं हैं। हम लोगों के सर नहीं काट लेते। हम स्वतंत्रता में विश्वास करते हैं। ईश्वर भी करता है। मैं बर्बर नहीं हूं। मैं तो स्वतंत्रता-प्रिय जनतंत्र का जनतांत्रिक रूप से निर्वाचित नेता हूं। हमारा समाज संवेदनशील समाज है। हम संवेदनशील बिजली के झटके तथा संवेदनशील प्राणघातक इंजेक्शन से मौत की सज़ा देते हैं। हमारा राष्ट्र महान है। मैं कोई तानाशाह नहीं हूं। वो है। मैं कोई बर्बर नहीं हूं। वो है। और वो है। वो सभी हैं। मेरे पास नैतिक अधिकार है। तुम यह घूंसा देख रहे हो? यह मेरा नैतिक अधिकार है। और इस बात को तुम भूल मत जाना।'

एक लेखक का जीवन अत्यंत असुरक्षित, लगभग नग्न कार्यवाही जैसा होता है। इस को लेकर हमें रोने की ज़रूरत नहीं है। लेखक अपना विकल्प चुनता है और फिर उसी विकल्प के साथ लेखक को रहना पड़ता है। लेकिन यह कहना सही है कि आप सब तरफ की हवाओं के लिए खुले होते हैं, जिनमें से कुछ बर्फीली भी होती हैं। आप अपने पर ही निर्भर रहते हैं, सभी खतरों के सामने। आपको कहीं शरण नहीं मिलती, कोई सुरक्षा नहीं होती – जब तक कि आप झूठ न बोलें – और उस मामले में तो आपने अपनी ही सुरक्षा बना ली है तथा आप, कहा जा सकता है, राजनीतिज्ञ बन गए हैं।

आज शाम को मैंने कई बार मृत्यु का ज़िक्र किया है। अब मैं अपनी ही एक कविता 'मृत्यु' का एक अंश पढ़ूंगा।

लाश कहाँ मिली थी?
लाश किसको मिली थी?
लाश जब मिली तब क्या वह मृत थी?
लाश मिली कैसे थी?

लाश थी किसकी?

पिता या भाई कौन था या बेटी कौन थी
या चाचा या मामा या बेटा कौन था या माँ या बहन कौन थी
उस मृत और लावारिस शरीर के?

लावारिस होने से पहले क्या शरीर मृत था?
क्या लाश लावारिस ही थी?
किसने उसे वहाँ छोड़ा था?

क्या मृत शरीर नंगा था या उस पर यात्रा की तैयारी में पहने गए कपड़े थे?

आपने किस आधार पर निर्णय किया कि शरीर मर चुका था?
क्या आपने निर्णय किया था कि शरीर मर चुका है?
आप लाश को कितना क़रीब से जानते थे?
आपको कैसे पता चला कि शरीर मर चुका है?

क्या आपने लाश को धोया था
क्या आपने उसकी आँखें बंद की थीं
क्या आपने उसे दफ़नाया था
क्या आपने उसे वहाँ छोड़ा था
क्या आपने लाश को चूमा था

जब हम आईने में देखते हैं तो हमें लगता है कि जिस छवि से हमारा सामना है वह एकदम सही है। पर एक मिलीमीटर भी हिलें तो छवि बदल जाती है। हम असल में प्रतिबिंबों के अनंत रूपों को देख रहे हैं। लेकिन कभी-कभी लेखक को आईने को तोड़ना पड़ता है – क्योंकि सच हमें घूर रहा होता है आईने के दूसरी तरफ से।

मेरा मानना है कि भयंकर बाधाओं के बावजूद, नागरिकों के तौर पर, अपने जीवन तथा अपने समाजों के असली सच को बिना हिचक के, बिना विचलित हुए, अडिग बौद्धिक संकल्प के साथ परिभाषित करने की निर्णायक ज़िम्मेदारी अंततः हम सब पर ही है। बल्कि ऐसा करना तो अनिवार्य है, अपरिहार्य है।

अगर ऐसा संकल्प हमारी राजनैतिक दृष्टि का ही अभिन्न अंग नहीं बन जाता तो जो हम खो चुके हैं उसे दोबारा पाने की कोई उम्मीद नहीं बचेगी – मानव मात्र का आत्मगौरव।


* "मैं कुछ बातें समझाना चाहूंगा" से उद्घरित, नाथानिएल टार्न द्वारा अनुवादित, पाब्लो नेरूदा: चयनित कविताएं, प्रकाशक जॉनाथन केप, 1970, लंदन। साभार द रैंडम हाउस ग्रुप लिमिटेड।


अनुवादक: अनिल एकलव्य
अनुवाद तारीख: 11 अप्रैल, 2007
Original article