ग़ैर-टिकाऊ अविकास
नोम चॉम्स्की
30 मई, 2000
हाल ही में एक वार्ता के दौरान चोम्स्की से पूछा गया "अमरीका द्वारा विकासशील देशों में टिकाऊ विकास पर ज़ोर दिए जाने के क्या उद्देश्य हैं?" उनका जवाब यह था...
ऐसा तो मैं पहली बार सुन रहा हूँ - क्या अमरीका टिकाऊ विकास पर ज़ोर दे रहा है? जहाँ तक मैं जानता हूँ, अमरीका का ज़ोर ग़ैर-टिकाऊ अविकास पर है। जो कार्यक्रम अमरीकी नीतियों का हिस्सा हैं, विश्व व्यापार संगठन के नियमों पर एक नज़र डाल लें, जैसे ट्रिप और ट्रिम - व्यापार संबंधी बौद्धिक संपत्ति तथा व्यापार संबंधी निवेश उपाय आदि कार्यक्रम विकास को और वृद्धि को अवरुद्ध करने के लिए ही बने हुए लगते हैं। इसलिए बौद्धिक संपत्ति के अधिकार बस एकाधिकारपूर्ण मूल्य निर्धारण और नियंत्रण बनाए रखने के लिए है, यह सुनिश्चित करते हुए कि निगमों, जो अब महानिगम बन चुके हैं, के पास एकाधिकारपूर्ण मूल्य निर्धारित करने के अधिकार रहें, और यह भी सुनिश्चित करते हुए कि, मिसाल के तौर पर, औषधियों का मूल्य इतना बना रहे कि ज़्यादातर दुनिया की पहुँच से बाहर रहे, यहाँ के लोगों की भी। उदाहरण के लिए अमरीका में दवाइयाँ उससे कहीं मँहगी हैं जितनी पड़ौस के कनाडा में, उससे भी कहीं मँहगी जितनी यूरोप में, और तीसरी दुनिया में इसका मतलब है दसियों लाख लोगों को मौत के मुँह में ढकेलना।
अन्य देश दवाइयाँ बना सकते हैं। और पुरानी पेटेंट व्यवस्था के अंतर्गत आपका पेटेंट प्रक्रिया पर, तरीके पर, होता था। मुझे यह तो पता नहीं कि ये वैध हैं या नहीं, पर प्रक्रिया पेटेंट का मतलब है कि अगर किसी औषधि कंपनी ने किसी दवाई को बनाने का तरीका विकसित किया हो तो कोई अधिक चतुर व्यक्ति उसी दवाई को बनाने का बेहतर तरीका ढूंढ सकता था क्योंकि जिस पर पेटेंट दिया गया था वह सिर्फ़ प्रक्रिया थी। यानी अगर ब्राज़ीलियन औषधि उद्योग उसे बनाने का कोई सस्ता और बेहतर तरीका ढूँढ लेता था तो वो उस तरीके से दवाई बना सकता था। ऐसा करने से पेटेंट का उल्लंघन नहीं होता था। इसके विपरीत विश्व व्यापार संगठन की व्यवस्था उत्पाद आधारित पेटेंट पर ज़ोर देती है, जिसके चलते आप एक बेहतर तरीका नहीं ढूँढ सकते। ध्यान दें कि इससे वृद्धि और विकास में बाधा पड़ती है, और उद्देश्य भी यही है। उद्देश्य है सृजनात्मकता, वृद्धि और विकास में कटौती करना और लाभ को असाधारण स्तर तक बनाए रखना।
वैसे औषधि निगमों तथा कई अन्य लोगों का कहना है कि उनके लिए ऐसा करना ज़रूरी है ताकि वे अनुसंधान और विकास के खर्चों की भरपाई कर सकें। लेकिन ज़रा ध्यान से देखें। अनुसंधान और विकास के एक बड़े हिस्से के लिए तो वैसे भी जनता का पैसा लगता है। एक सीमित अर्थ में यह 40-50% के आस-पास है। लेकिन यह अंदाज़ा कम है, क्योंकि इसमें बुनियादी जैव-विज्ञान और बुनियादी विज्ञान शामिल नहीं है, जो कि सारा जनता के पैसे से ही चलता है। तो अगर आप एक वास्तविक अंक को देखेंगे तो यह एक बहुत बड़ा प्रतिशत है जिसे सार्वजनिक खर्चे पर चलाया जाता है। अब मान लीजिए यह अंक 100% तक पहुँच जाता है। ऐसे में एकाधिकारवादी मूल्य निर्धारण का कोई उद्देश्य नहीं रह जाएगा, और यह समाज कल्याण के हक में एक बहुत बड़ा फ़ायदा होगा। ऐसा न करने का कोई उपयुक्त आर्थिक कारण नहीं है। एक आर्थिक उद्देश्य है, लाभ, पर यह वृद्धि और विकास को अवरुद्ध करने की कोशिश है।
सवाल हो सकता है कि व्यापार संबंधी निवेश उपायों का क्या होगा? ये उपाय क्या करते हैं? ट्रिप्स तो सीधे-सीधे अमीर और ताकतवर निगमों, जिनको सार्वजनिक धन से रियायतें दी जाती हैं, के पक्ष में संरक्षणवाद है। ट्रिम की बात थोड़ी ज़्यादा बारीक है। उनके अनुसार कोई देश किसी निवेशकर्ता के निर्णयों पर रोक नहीं लगा सकता। मान लीजिए जनरल मोटर्स आउटसोर्स करने का, यानी अपने कल-पुर्जों का निर्माण किसी अन्य देश में करवाने का, जहाँ मज़दूर संगठनों से मुक्त सस्ता श्रम उपलब्ध हो, और उन्हें वापस जनरल मोटर्स में लाने का निर्णय लेती है। अब ऐसे में एशिया के सफल विकासशील देशों को देखें तो उनके विकास करने का एक तरीका था इस तरह की चीज़ को रोकना, यह ज़ोर देते हुए कि अगर विदेशी निवेश होना है तो उसे इस तरीके से होना पड़ेगा कि वह प्राप्त करने वाले देश के लिए उत्पादनशील हो। तो यह ज़रूरी था कि तकनीक का आदान-प्रदान हो, या फ़िर आप वहीं निवेश कर सकते थे जहाँ वे चाहते थे, या कुल निवेश का कुछ हिस्सा ऐसी निर्मित वस्तुओं के निर्यात में लगना चाहिए जिनसे कुछ आय हो। ऐसी बहुत सी युक्तियाँ। यह भी एक कारण है पूर्वी एशिया के आर्थिक चमत्कार का। उल्लेखनीय है कि इसी तरीके से अन्य विकासशील देशों का भी विकास हुआ था, और इनमें संयुक्त राज्य भी शामिल है, जिसे इंग्लैंड से तकनीक मिली थी। व्यापार संबंधी निवेश उपायों के अंतर्गत इस तरीके पर रोक लग गई है। सतही तौर पर ये मुक्त व्यापार को बढ़ावा देती दिखती हैं, किंतु असल में ये निगमों की सीमा-पार लेन-देन के केंद्रीय प्रबंधन की क्षमता बढ़ा रही हैं, क्योंकि आउटसोर्सिंग तथा फ़र्म के अंदरूनी लेन-देन तो वही हैं - केंद्रीय रूप से प्रबंधित। यह तो वास्तविक अर्थ में व्यापार है ही नहीं। और ये वृद्धि तथा विकास में बाधा डालते हैं।
असल में अगर आप चारों तरफ देखें तो जिसे लागू किया जा रहा है वह एक ऐसी व्यवस्था है जो उस तरह के विकास को रोक देगी जो उन देशों में हुआ जो आज अमीर देश हैं, औद्योगिक देश हैं - यह हालांकि ऐसा सर्वोत्तम विकास नहीं है जो संभव है, फिर भी एक तरह का विकास तो है। अगर आप पीछे जाएं तो इंग्लैंड से अमरीका को, जर्मनी को, फ़्रांस को, जापान को, कोरिया को - इनमें से हर देश ने अपना विकास उन सिद्धांतों का पूरी तरह उल्लंघन करके किया जिन्हें अब विश्व व्यापार संगठन का हिस्सा बनाया जा रहा है। ये सिद्धांत ऐसे तरीके हैं जो वृद्धि और विकास में गतिरोध डाल रहे हैं और सारी ताकत को एक जगह केंद्रित कर रहे हैं। टिकाऊ विकास का तो मुद्दा ही नहीं उठता। वो तो बिल्कुल ही अलग सवाल है। टिकाऊ विकास का मतलब है, मिसाल के तौर पर, 'बाहरी' चीज़ों पर ध्यान देना, जिन पर धंधा करते समय ध्यान नहीं दिया जाता।
जैसे व्यापार को ले लीजिए। माना जाता है कि व्यापार धन-संपत्ति बढ़ाता है। शायद बढ़ाता हो, शायद ना बढ़ाता हो, लेकिन बढ़ाता है या नहीं यह आप तब तक नहीं जान सकते जब तक आप व्यापार की लागतों को नहीं गिन लेते, उन लागतों सहित जिन्हें नहीं गिना जाता, जैसे कि प्रदूषण की लागत। जब कोई वस्तु एक जगह से दूसरी जगह ले जाई जाती है तो उससे प्रदूषण पैदा होता है। इसे बाहरी बात - अप्रासंगिक - कहा जाता है; आप ऐसी बातों को गिनती में नहीं लेते। इसी श्रेणी में संसाधनों का क्षरण है, यानी आप कृषि विकास के लिए संसाधनों का दोहन करते हैं। फिर सैनिक लागतें हैं। जैसे खनिज तेल की कीमत को लें तो पेंटागन के एक प्रमुख भाग द्वारा मध्य पूर्व के तेल उत्पादकों को ध्यान में रख कर, इसे सीमाओं के बीच रखा जाता है, न तो बहुत ऊपर न बहुत नीचे, इसलिए नहीं कि अमरीका को रेगिस्तान में प्रशिक्षण बहुत पसंद है या ऐसा ही कुछ, बल्कि इसलिए कि तेल तो वहीं है। आप यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि इसकी कीमत न बहुत ऊपर जाए, न बहुत नीचे, बल्कि वहाँ रहे जहाँ आप चाहते हैं। इसकी ज़्यादा जाँच-पड़ताल नहीं हुई है, पर अमरीकी ऊर्जा विभाग के एक सलाहकार के एक शोध के अनुसार अनुमानित रूप से तेल पर अनुदान का लगभग 30% तो पेंटागन के खर्चे से आता है।
आप चारों तरफ देखिए तो ऐसी बहुत सी बातें नज़र आएंगी। व्यापार की एक और लागत है कि यह लोगों से उनका रोज़गार छीन लेता है। जब आप अनुदान की मदद से पैदा किए गए अमरीकी कृषि उत्पाद मैक्सिको को निर्यात करते हैं तो इससे लाखों किसानों को खेती छोड़नी पड़ती है। यह भी एक लागत है। असल में यह बहु-आयामी लागत है, क्योंकि इससे लाखों लोगों का उत्पीड़न ही नहीं होता, उन्हें शहरों में खदेड़ दिया जाता है जहाँ वे मज़दूरी या आय को घटा देते हैं, जिससे दूसरे लोग भी उत्पीड़ित होते हैं - उल्लेखनीय है कि इनमें अमरीकन मज़दूर भी शामिल हैं, जिन्हें ऐसी हालत में और भी कम मज़दूरी के लिए होड़ करनी पड़ती है। यह भी लागतें हैं। अगर आप इन्हें गिनती में लेंगे तो आपको आर्थिक लेन-देन की एक बिल्कुल ही अलग तस्वीर दिखाई देगी।
वैसे यही बात सकल घरेलू उत्पाद पर भी लागू होती है। आप सकल घरेलू उत्पाद के मापकों को देखें तो पाएंगे कि ये सभी विचारधारात्मक हैं। उदाहरण के लिए, संयुक्त राज्य में सकल घरेलू उत्पाद को बढ़ाने का एक तरीका, जिसका वास्तव में उपयोग किया जा रहा है, वह है सड़कों की मरम्मत न करना। अगर आप सड़कों की मरम्मत न करें तो सारे रास्ते में गड्ढे होंगे, जिसका मतलब है कि अगर वहाँ कारें चलाई जाएंगी तो उनमें टूट-फूट होगी। इसका मतलब हुआ कि आपको नई कार खरीदनी पड़ेगी। या फिर आपको मकैनिक के पास जाना पड़ेगा, वगैरह, वगैरह। इस सबसे सकल घरेलू उत्पाद में बढ़ोत्तरी होगी। आप पर्यावरण में प्रदूषण बढ़ा कर लोगों को बीमार बनाते हैं। इससे भी सकल घरेलू उत्पाद बढ़ता है क्योंकि उन्हें अस्पताल जाना पड़ेगा और उन्हें डॉक्टरों की फ़ीस चुकानी पड़ेगी और उन्हें दवाइयाँ खरीदनी पड़ेंगी, इत्यादि। असल में जो चीज़ें समाज में, उसकी वर्तमान संरचना के अंतर्गत, सकल घरेलू उत्पाद को बढ़ाती हैं वे अक्सर किसी भी अर्थपूर्ण ढंग से समाज कल्याण में कोई योगदान नहीं देतीं।
ऐसे मापक बनाने के प्रयास हुए हैं जो इन सब बातों को ध्यान में रखें और ये मापक बिल्कुल अलग कहानी कहते हैं। मिसाल के तौर पर, अमरीका उन मुट्ठी भर औद्योगिक राष्ट्रों में से है जो नियमित रूप से "सामाजिक संकेतक" नहीं प्रकाशित करते - समाज कल्याण के संकेतक, जैसे कि बच्चों के प्रति दुर्व्यवहार, मृत्यु दर आदि जैसी ढेर सारी चीज़ें। बहुत से देश ऐसे संकेतकों को प्रकाशित करते हैं। हर साल उनके यहाँ समाज कल्याण के मापक प्रकाशित होते हैं। संयुक्त राज्य में ऐसा नहीं होता, इसलिए इस देश के सामाजिक स्वास्थ्य का अंदाज़ा लगाना मुश्किल है। लेकिन ऐसा करने के प्रयास हुए हैं।
न्यू यॉर्क के एक जेसूट विश्वविद्यालय, फोर्डहैम विश्वविद्यालय, में एक बड़ी परियोजना है। कई सालों से वे संयुक्त राज्य के सामाजिक स्वास्थ्य के मापक बनाने के प्रयास कर रहें है। उन्होंने अभी कुछ ही महीने पहले अपना नया अंक निकाला है। इनमें रोचक जानकारी है। जिस तरह के मापकों की मैंने बात की उन पर आधारित विश्लेषण के अनुसार लगभग 1975 तक, यानी जिसे "स्वर्ण युग" कहा जाता है, सामाजिक स्वास्थ्य अर्थव्यवस्था के साथ ही ऊपर गया। यह एक तरह से अर्थव्यवस्था के साथ चलता रहा। जैसे-जैसे अर्थव्यवस्था बेहतर होती गई, सामाजिक स्वास्थ्य भी सुधरता गया। 1975 से दोनों का रास्ता बदल गया। अर्थव्यवस्था पहले की तरह बढ़ती गई, हालांकि पहले से कम दर पर, लेकिन सामाजिक स्वास्थ्य गिर गया। और तबसे यह गिर ही रहा है। असल में उनका निष्कर्ष तो यह है कि अमरीका आर्थिक गिरावट के दौर में है, उन मापकों के हिसाब से जिनका वास्तव में महत्व है। महत्व मतलब जब आप टिकाऊ विकास, अर्थपूर्ण विकास आदि जैसे सवालों पर ध्यान देना शुरू कर देते हैं। लेकिन इसके लिए आर्थिक मुद्दों तथा उनके नतीजों आदि पर एक बिल्कुल नई दृष्टि से देखने की ज़रूरत है, और सख्त ज़रूरत है। तो ये मुद्दे हैं जो सामने आते हैं जब लोग टिकाऊ विकास के बारे में बात करते हैं, मगर अमरीका में ऐसा कोई कार्यक्रम नहीं है। होना चाहिए, पर है नहीं।
अनुवाद तारीख: 5 अप्रैल, 2007
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